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Showing posts from 2020
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तुम अपने को मुक्त कर लेने से डरती हो तुम खुद को क्रिटिसाइज करने से बचती हो तुम अकेले कुछ बहार खा लेने से डरती हो तुम अपनी पसंद को भी न-पसंद करती हो तुम न चाहते हुए भी सहारा ढूंढ़ती हो, लोग क्या सोचेंगे ये भी तुम ही सोचती हो तुम खुद को जीने का चांस देते-देते हर बार मुकरती हो तुम खुद के लिए जीने से डरती हो तुम कुछ जगहों पर आते हुए भी बोलने से बचती हो तुम खुद के कहे को कितनी ही बार नकारती हो तुम खुद से प्यार करते हुए, अच्छा दिखना चाहती हो लेकिन किसी और को अच्छे दिख जाने के डर से तुम फिर बचती हो तुम ये छिपते-छुपाते, मन मार कर, हर बार जो खुश होने की एक्टिंग करती हो, बस यही है जो तुम दिखने की कभी नही सोचती पर हर बार वैसी ही दिखती हो।
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तुम चले तो गए पर ये होंठों पर तुम्हारी गरमाहट का एहसास रह गया ये मेरी बाहों में बैठा तुम्हारा सुकून रह गया ये मेरी गोद में तुम्हारे रखे सर का हल्कापन रह गया ये मेरी जुल्फों का बिखरने पर तुम्हारे समेटने का निशान रह गया, ये मेरी उंगलियों में तुम्हारी उंगलियों का स्पर्श रह गया ये हथेलियों में हमारे साथ का भविष्य रह गया ये मेरे पैरों में चुभ आया कंकड़, तुम्हारे हाथों से निकालना रह गया ये तुम्हारे पास चल के आने का एहसास रह गया तुमसे मिलने की कसक रह गई ये चादर पर हमारी पड़ती सिलवटें रह गई ये मेरी बालियों का तुम्हारी उंगलियों से छूने का एहसास रह गया, तुम्हारे देखने पर मेरी आँखों का झुकना रह गया ये मेरे चिल्लाने पर तुम्हारा झुकना रह गया यूं तुम्हारे डाँटने पर मेरा रोना रह गया ये तुम्हारे साथ निभाने का वादा रह गया ये हमारे साथ होने का एहसास रह गया।        
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ये जो है उदास ये जो ग़मगीन है टूट कर बरसे है उदास ही नही, कुछ खुश भी है कुछ उलझे है, कुछ सुलझे है कुछ है मस्त, कुछ है परस्त कुछ है खोए, कुछ जागे है कुछ ठिठक कर भागे है, कुछ जाने क्या खोज रहे कुछ जाने क्या पाएं है, ये जो टूट कर गिरे है कुछ भागे है कुछ ठहरे है कुछ है ख्यालों में ग़ुम से कुछ बस अभी ख्वाब से जागे है, कुछ मग्न है धुनों में अपनी कुछ है ग़म की परछाई में, कुछ है बेबाक कुछ है बिखरें कुछ है सिमटे कुछ है बावले कुछ ग़ुम से है कुछ चुप से है ये सब जो यहाँ पड़े हुए कुछ है उदास टूट कर बरसे है।
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जब लिखने लगती हूँ तो लगता है स्त्री का सौंदर्य बिखर पड़ता है उसके बालों में उसकी उंगली या उसके उलझे बाल उसकी साड़ी की सिलवटें उसकी वो बिंदी और श्रृंगार का सभी समान खुल जाता है मेरी बंद आँखों में उसको कई बिंबों से सजा देना चाहती हूं कई उपमाएं दे लेना चाहती हूं पर फिर सोचती हूँ समस्या भी उसकी कुछ कम नही उसकी अपनी क्रांति उसका डर उसकी नजरों का बुरा समाज और वो समाज जो उसे जीने नही देता पर फिर सोचती हूं हैं कितना कुछ लिखने का पुरुषों पर मैं कब तक लिखूंगी खुद पर पुरुष तुम भी तो हों समाज और समस्या के शिकार उस बीच मेरा प्रेम और उसका भी तो है त्याग पर क्या, सिर्फ लिखना ही स्त्रियों पर है पर लिखूं क्या उस पुरुष पर जो खुद भी है अकेला ।
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मेरी देह हमेशा से पुरुष की देह बनी रही शायद मेरी देह होने का एहसास ही उससे था एक समय था जब उस देह को नौचा-खचोटा गया पर शायद उस समय वो पुरुष लाचार था उसे नही पता था उस देह का अर्थ किंतु उसके बाद उस देह को पुरुष ने प्यार किया खूब प्यार किया उस देह से चिपट कर जैसे वो स्त्री नही उसकी खुद की देह हों वो उस देह को अपने अंदर समाने की जद्दोजहद में लगा फिर खुद ही उसका सुख पा कर उस को चूम कर सीने से लग जाता है पर हाँ प्यार करता है वो मुझ से मेरी देह से ज्यादा पुरुष प्रेम का इजहार करता है पर क्या करें जो स्त्री की देह बीच में आ जाती है उसे बदनाम और दरिंदा बताती है वो प्यार करता है स्त्री से पर हाँ पुरुष की देह को चूमने पर वो कभी इल्जाम नही लगाता है वो उसमें ही प्यार का सुख पाता है पर स्त्री खुद नही जानती उसकी देह ही पुरुष के लिए कब उसकी दुश्मन बन जाती है वो नही जानती प्रेम में स्त्री की देह बीच में आती है। 
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पुरुष होने के मायने पुरुष का पौरुषत्व उसे दृढ़ बने रहने देना चाहता हैं वो रोना चाहता हैं फूट कर बहुत बार हारता हैं पर उसका पौरुषत्व उसे दृढ़ बनाता हैं वो झुकना चाहता हैं कई बार मांगना चाहता हैं माफियां कई स्त्रियों से पर उसका पौरुषत्व आड़े आता हैं उसके जो उसे झुकने नहीं देता टूटने नहीं देता पिघलने नहीं देता रोने नहीं देता वो अपनी बनी बनावट पर कई बार धिक्कारना चाहता हैं पर फिर थक हार कर अपनी बनी बनावट से संतोष पाता हैं और न जाने कितनी ही बार वो रोता होगा अंधेरे में ताकि देख न ले कोई उसके पौरुषत्व का ये फीका चेहरा अगर देखेगा कोई तो उसके पौरुषत्व का उड़ेगा मज़ाक इसलिए एक मर्द के आँसू महज आंसू नहीं होते है उनके पीछे छुपी कई वर्षों की वेदना का गहन भण्डार होता है जिसे वो आंसुओ के सहारे निकाल लेने की असफल कोशिश करता है पुरुष ने अपने हृदय को हल्का कर लेने का सुख नहीं पाया वो क्रुरुर हैं हिंसात्मक हैं पर वो पुरुष हैं जो रोना चाहता हैं। मुझे लगता है हम स्त्रियों ने मर्दो से ये रोने का,आंसू बहाने का, सबसे बड़ा सुख छीन लिया है जिसके रहते वो सिर्फ और सिर्फ...