तुम अपने को मुक्त कर लेने से डरती हो
तुम खुद को क्रिटिसाइज करने से बचती हो
तुम अकेले कुछ बहार खा लेने से डरती हो
तुम अपनी पसंद को भी न-पसंद करती हो
तुम न चाहते हुए भी सहारा ढूंढ़ती हो,
लोग क्या सोचेंगे
ये भी तुम ही सोचती हो
तुम खुद को जीने का चांस देते-देते हर बार मुकरती हो
तुम खुद के लिए जीने से डरती हो
तुम कुछ जगहों पर आते हुए भी बोलने से बचती हो
तुम खुद के कहे को कितनी ही बार नकारती हो
तुम खुद से प्यार करते हुए, अच्छा दिखना चाहती हो
लेकिन किसी और को अच्छे दिख जाने के डर से तुम फिर बचती हो
तुम ये छिपते-छुपाते, मन मार कर, हर बार जो खुश होने की एक्टिंग करती हो,
बस यही है
जो तुम दिखने की कभी नही सोचती
पर हर बार वैसी ही दिखती हो।

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