जब लिखने लगती हूँ
तो लगता है
स्त्री का सौंदर्य बिखर पड़ता है
उसके बालों में उसकी उंगली
या
उसके उलझे बाल
उसकी साड़ी की सिलवटें
उसकी वो बिंदी
और
श्रृंगार का सभी समान
खुल जाता है मेरी बंद आँखों में
उसको कई बिंबों से सजा देना चाहती हूं
कई उपमाएं दे लेना चाहती हूं
पर फिर सोचती हूँ
समस्या भी उसकी कुछ कम नही
उसकी अपनी क्रांति
उसका डर
उसकी नजरों का बुरा समाज
और
वो समाज जो उसे जीने नही देता
पर फिर सोचती हूं
हैं कितना कुछ लिखने का पुरुषों पर
मैं कब तक लिखूंगी खुद पर
पुरुष तुम भी तो हों
समाज और समस्या के शिकार
उस बीच
मेरा प्रेम और उसका भी तो है त्याग
पर क्या, सिर्फ लिखना ही स्त्रियों पर है
पर लिखूं क्या उस पुरुष पर
जो खुद भी है अकेला ।

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